Tuesday, April 21, 2015

फितरत ऐ खुदाई




तेरी जादुई उंगलियो से ,
बार बार खिलता बिखरता,
लड़खड़ाते चोट खाते  मंजर पर भी ,
दरवाज़े खोल के जिया दिलो  को,

डूबा हूँ आगोश में कई बार, कई रूप में तेरे,
कभी तेरी सांसे, तो कभी सांसो के बीच का सन्नाटा,
खुद को  डूबोया हर रंग में तेरे,
चलता ही रहा, ना देखा मूड के कभी,

हर बार बारिश की हवा की  तरह,
नज़दीकियां आती और चली जाती,
कभी आती उम्मीदो के पिटारे  की तरह,
सपने दिखती, और धीरे से कही खो जाती,

मिलान तो ना आता, तनहाई जरूर आती,
पर मै पगला चलता ही रहा चलता ह रहा
क्यूंकि हर छलावे से छिला दिल, और नरम,
और खूबसूरत हो जाता, जब देता मै अलविदा,

आब दिल काफी छिल चूका है,
रंगो को सोक चूका है,
कटते  काटते  इस समय के आशियाँ में
रह चूका है बहुत,

आब बर्फ पिघल रही है,
पानी बह रहा है,
हर पतीले के रूंप  में ढलके भी,
दिल का एक टुकता ,
साँसों के बीच की खामोशियों में आगोश सा
रहता है,
फितरत ऐ खुदाई,
तेरी साँसों के नशे से मदहोश,
लहरों से ढकेला किनारे पर,
आब तेरी खामोशियों में ,
आज़ाद , बेरंग से रंग के इस आकाश में
धुए की तरह घुल रहा हूँ

ये कविता नहीं है,
पर उन अनकहे शब्दों की,
आवाज है,  जिसे इंसान भूलने की कोशिश करता तो है,
पर बेचारा, जिससे बना है, उससे भले कब तक खामोश रख सकता है

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